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Showing posts from 2020

बिहार चुनाव

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  शुक्रिया नरेंद्र मोदी ,शुक्रिया नीतीश कुमार और शुक्रिया तेजस्वी  आप सब सोच रहे होंगे कि यह शुक्रिया किस लिए ?एक साथ तीनो को शुक्रिया ? जी हाँ। इसकी बहुत बड़ी वजह है,और वज़ह है बिहार का चुनाव।  इस बार बिहार विधान सभा का चुनाव बिलकुल अलग अंदाज़ में हो रहा है। सभी दलों ने अपने चुनावी घोषणा पत्रों में रोज़ी-रोज़गार को और नौकरियों को प्रमुख स्थान दिया है।  खुलेआम जात-पांत और अगड़े-पिछड़े की राजनीति करने वाले दल राजद ने  लालू यादव को नेपथ्य में डालते हुए युवा नेता तेजस्वी को अपना नेता बनाया है। एक दो चुनावी सभाओं की बात छोड़ दें ,तो तेजस्वी ने अपने भाषणों में सरकारी नौकरियां देने की बात कर युवाओं में आकर्षण पैदा कर दिया है। यह अलग बात है कि इन वादों को पूरा करना और सब को सरकारी नौकरी देना कितना संभव है ?फिर भी उस दल की तरफ से ऐसी बातों की चर्चा होना, जिस पर बिहार को गर्त में ले जाने के तमाम आरोप लगते रहें हों ,निश्चित रूप से सुखद है।  तेजस्वी का ऊर्जा से भरा हुआ भाषण और आत्मविश्वास उन्हें एक परिपक़्व नेता तो निश्चित रूप से बना दिया है।  बिहार की चर्चा के केंद्...

डायरी के पन्ने

 डायरी के पन्ने    कुछ अधूरी गज़ले थी, कुछ सूखे गुलाब थे, मेरे डायरी के पन्नो पर.  कितने सारे ख़्वाब थे.  निगाहों के सवाल थे, निगाहों के जवाब थे पुरे दिन की बाते थी, रातों के हिसाब थे. मन कहीं तो और था, पर हाथों में किताब थे दोस्त मेरे कम ही थे, जो भी थे नायब थे. संजय सिंह  23 /10 2020   

हाथरस का सच

                                                         हाथरस का सच   हाथरस की घटना से पूरा देश मर्माहत है।  पीड़िता की  अस्मिता के साथ खेलने वाले और उसकी जान लेने वाले को कठोर से कठोर दंड मिलना चाहिए।  भारतीय कानून में निर्भया कांड के बाद जो परिवर्तन हुए हैं, उसको देखते हुए यह कहना गलत होगा कि दोषियों को किसी तरह की राहत की गुंजाईश होगी। लाख कोशिशों के बावजूद निर्भया कांड के सभी अभियुक्तों को अंत में फांसी पर लटकना ही पड़ा। हाथरस की घटना को यदि गौर से देखा जाये तो यह प्रतीत होता है कि इसमें कुछ निर्दोष लोगों को भी फंसाया गया है।जिस तरह से पीड़िता का पहला बयान है,उसमे केवल एक अभियुक्त का नाम लिया गया। बाद में उसकी माँ का बयान भी पीड़िता के बयान से मिलता हुआ लगा। घटना की प्रारम्भिक रिपोर्ट पीड़िता के भाई के द्वारा थाने में दर्ज कराई गयी ,उसमे भी एक अभियुक्त के अलावा किसी और का नाम नहीं है। उस रिपोर्ट में भी बलात्कार...

गज़ल

गज़ल  कोई हक़ीक़त कहेगा, कोई अफसाना कहेगा कोई अपना कहेगा,कोई बेगाना कहेगा , जब निकलोगे खुद का मुक़द्दर तलाशने, न जाने क्या क्या ये  ज़माना कहेगा।  मंजिल पाने की ज़िद जिन्हे होती है पुरकश , आधे रस्ते को क्या वो ठिकाना कहेगा ? बंदगी हो या इश्क़ ज़रा करके तो देखो, कोई पागल कहेगा ,कोई दीवाना कहेगा।  समझ कर भी कोई नासमझ बन बैठे, कोई बेखबर तो कोई अंजाना कहेगा।  थके मांदे जब लौट कर आओगे घर, उसी घर को सब आशियाना कहेगा।                         दर्द सहकर भी ओठों से उफ़ तक न निकले,                              सब्र का सब इसे पैमाना कहेगा।                              बिना जाम के ही जब नशा चढ़ जाये,                             नज़रों को हीं सब मयखाना कहेगा। ===========================================...

चुनौती

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चुनौती  चुनौती चाहें बड़ी हो कितनी, उसको तुम स्वीकार करो, लड़ो शेर की भांति ,बढ़ो आगे और वार करो।  इस मिट्टी की कसम है तुमको, कदम नहीं रुकने देना, कट जाये शीश कोई बात नहीं,शीश नहीं झुकने देना।  जन जन के प्यारे हो तुम जन जन को तुम प्यार करो, चुनौती चाहे बड़ी हो कितनी, उसको तुम स्वीकार करो। सारे खेत खलिहान तुम्हारे, पुरखों के निशान तुम्हारे, खोई शक्ति प्राप्त करो तुम, सारे तीर कमान तुम्हारे।  गिरे हुए को गले लगा लो, उनका तुम उद्धार करो, चुनौती चाहे बड़ी हो कितनी, उसको तुम स्वीकार करो। चक्रव्यूह को भेदना सीखो, लाक्षागृह से बचना सीखो। अगर लक्ष्य को पाना है तो , कष्टों को भी सहना सीखो।  हिमालय सा हौसला लेकर हर बाधा  को  पार करो , चुनौती चाहे बड़ी हो कितनी,उसको तुम स्वीकार करो। नहीं युद्ध उन्मादी हो तुम, पर लड़ने के आदि हो तुम, इतिहास के पन्ने पलटो, कितने अनंत अनादि हो तुम।   नई चेतना जागृत करके, ऊर्जा का संचार करो,  चुनौती चाहे बड़ी हो कितनी ,उसको तुम स्वीकार करो।  ज्वालामुखी सा फूट पड़ो, कहर बनकर तुम टूट पड़ो, सौ पर एक तुम भारी हो, संकल्पशक्ति से जुट ...

मो0 कौसर(मेरे बचपन का मित्र )

                             मो0 कौसर यह कहानी मेरे बचपन के मित्र मो0 कौसर की है,जिसके जीवन का दुखद अंत वर्ष 2006 के अगस्त महीने में हो गया था।इसे संयोग ही माना जा सकता है कि इसी दिन मेरे छोटे पुत्र का जन्म भी हुआ था। उसके पिता एक दूध व्यवसायी थे। पशुपालको से दूध  खरीद कर निकट के कस्बो के होटलों और  शादी-विवाह जैसे आयोजनो वाले घरों में बेचना उनका पेशा था।  एक दिन दूध बेच कर लौटते समय कुछ लुटेरो ने उनकी हत्या कर दी।छोटी सी उम्र में अपने पिता की हत्या हो जाने से उसे अत्यंत कष्ट का सामना करना पड़ा। मेरी और उसकी दोस्ती की शुरुआत अपने गाँव  के स्कूल से शुरू हुई थी।  जैसे जैसे समय बीतता गया हमारी मित्रता प्रगाढ़ होती चली गयी।  हम दोनों अपने शिक्षकों और गाँव वालो के नज़रों में काफी होनहार छात्र थे ,जिसके वज़ह से हमदोनों को कुछ  सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता था।   पिता की हत्या के बाद कौसर काफी शांत रहने लगा था।  अपने भाईयों  में वह सबसे छोटा था।  उसके बड़े भाईयों ने भी अ...

ग़ज़ल

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गज़ल  वादों की चाशनी में ये लिपटे हुए   नारे  उतार लाएंगे  ज़मी पर चाँद और सितारे, जाकर सो जाना नींद में गहरे , बिस्तर पर ही आते हैं ये ख़्वाब सारे। मिलना भी है जरुरी,पर मुश्किल बहुत है, उफनता हुआ दरिया और तुम उस किनारे।  न रब पर भरोसा, न खुद पर यकीं है , और कहते हो कि हैं मुक़द्दर के मारे।   भोर की किरणे दर पे आती हैं रोज़, उठो और समझो कुछ इनके इशारे।   नफरत भी आए तो कुछ यूँ लौट जाए, बना दो मोहब्बत की इतनी ऊँची दीवारें। ---------------------------------------------  संजय कु सिंह    

स्वतंत्रता के मायने

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स्वतंत्रता के मायने  कोरोना काल का दौर हमें इस शब्द के बेहद करीब ला रहा है। अपने आप को और अपने परिवार को सुरक्षित रखने के लिए हमें कई पाबंदियों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ दिन पहले तक हमारे जीवन में जितनी स्वतंत्रता थी ,उतनी आज नहीं है। लोगों के अंदर की बेचैनियां स्पष्ट दृष्टिगोचर है।   स्वाभाविक रूप से हम अंदाजा लगा सकते हैं कि गुलाम भारत में लोगों की क्या स्थिति रही होगी। पढ़ने,लिखने, बोलने और जीवन जीने के तमाम तरीकों पर अंग्रेजों ने पाबंदियां लगा रखी थी। छोटी छोटी गलतियों के लिए लोगों को पुलिस और अंग्रेजों के पिठ्ठुओं के बर्बरता का सामना करना पड़ता था। आज जिस स्वतंत्रता का आनंद हमलोग उठा रहे हैं, इसको पाने के लिए हमारे पूर्वजों ने अनगिनत कुर्बानियां दी है।   जरूरत है इसके महत्व को समझने की।  केवल 15 अगस्त को तिरंगा झंडा फहरा देने भर से हमारी भूमिका समाप्त नहीं हो जाती है।  हमें अपने अधिकार के साथ साथ कर्तव्यों का भी भलीभांति निर्वहन करना हैं।  हमारी वजह से दूसरों की स्वतंत्रता  में भी बाधा  नहीं आनी चाहिए। बोलना अगर  आजादी है तो च...

गीत

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गीत साजन अब तो आओ ना मुझको यूँ तड़पाओ ना | विरह- वेदना की अग्नि से, और हमें झुलसाओ ना। आँगन सुना, देहरी सुनी तुम्हरे बिन अब जिंदगी सुनी, दिल की सुखी बगिआ को आके अब महकाओ ना। बदरा घिरी आवे है जब-जब, हुक जिआ से निकले तब -तब, विरहन सी भटकी मैं वन -वन आके राग वसंती गाओ ना। दर्पण भी जाने है हाल, पायल, बिदिंया करे सवाल, मेरे बुझे तन -मन को, अपने हाथों से सजाओ ना। साजन अब तो आओ ना, मुझको यूँ तड़पाओ ना। (संजय कु सिंह) पटना

वह कौन था ?

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 वह कौन था ? बीता हुआ कल एक यादों का पुलिंदा होता है। उन यादों में कुछ ऐसी यादें भी शामिल होती हैं जिन्हें आप चाह कर भी नहीं भुला पाते। ऐसा हर व्यक्ति के जीवन में होता है।  आज मैं भी अपने यादों के झरोखे से एक ऐसी घटना को निकाल रहा हूं जिसे मैं भूल नहीं पाता। इस घटना ने मेरी ईश्वरीय शक्ति पर भरोसे को भी मजबूत किया है।  वर्ष 2001, महीना जुलाई। इसी वर्ष जून के महीने में मेरी शादी हुई थी। अपनी शादी और अन्य पारिवारिक दायित्वों की वजह से मैं लंबे समय से अपने गांव में ही रह रहा था। मेरा गांव बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के अंतर्गत आता है ।  बूढ़ी गंडक और बागमती नदी  से घिरा यह क्षेत्र वैसे तो पिछड़े  श्रेणी  के क्षेत्र में आता है,  किंतु नदियों और आम लीची के बगीचों की वजह से इसकी अपनी एक खूबसूरती भी है। मेरा परिवार क्षेत्र के संपन्न किसानों में आता है। खेती- बारी की वजह से जमीनी विवाद से गहरा रिश्ता भी रहा है। कोर्ट कचहरी तो जैसे दिनचर्या का हिस्सा ही था। उस दिन मैं कचहरी के काम से मोतिहारी गया था। कचहरी के कामों को निपटा कर जब मैं घर वापसी के लिए मोतिहार...