गज़ल

गज़ल 

कोई हक़ीक़त कहेगा, कोई अफसाना कहेगा

कोई अपना कहेगा,कोई बेगाना कहेगा ,

जब निकलोगे खुद का मुक़द्दर तलाशने,

न जाने क्या क्या ये  ज़माना कहेगा। 


मंजिल पाने की ज़िद जिन्हे होती है पुरकश ,

आधे रस्ते को क्या वो ठिकाना कहेगा ?


बंदगी हो या इश्क़ ज़रा करके तो देखो,

कोई पागल कहेगा ,कोई दीवाना कहेगा। 


समझ कर भी कोई नासमझ बन बैठे,

कोई बेखबर तो कोई अंजाना कहेगा। 


थके मांदे जब लौट कर आओगे घर,

उसी घर को सब आशियाना कहेगा।


                        दर्द सहकर भी ओठों से उफ़ तक न निकले,

                             सब्र का सब इसे पैमाना कहेगा। 


                            बिना जाम के ही जब नशा चढ़ जाये,

                            नज़रों को हीं सब मयखाना कहेगा।

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संजय कुमार सिंह

पटना 





 

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