मो0 कौसर(मेरे बचपन का मित्र )
मो0 कौसर
यह कहानी मेरे बचपन के मित्र मो0 कौसर की है,जिसके जीवन का दुखद अंत वर्ष 2006 के अगस्त महीने में हो गया था।इसे संयोग ही माना जा सकता है कि इसी दिन मेरे छोटे पुत्र का जन्म भी हुआ था।
उसके पिता एक दूध व्यवसायी थे। पशुपालको से दूध खरीद कर निकट के कस्बो के होटलों और शादी-विवाह जैसे आयोजनो वाले घरों में बेचना उनका पेशा था।
एक दिन दूध बेच कर लौटते समय कुछ लुटेरो ने उनकी हत्या कर दी।छोटी सी उम्र में अपने पिता की हत्या हो जाने से उसे अत्यंत कष्ट का सामना करना पड़ा।
मेरी और उसकी दोस्ती की शुरुआत अपने गाँव के स्कूल से शुरू हुई थी। जैसे जैसे समय बीतता गया हमारी मित्रता प्रगाढ़ होती चली गयी। हम दोनों अपने शिक्षकों और गाँव वालो के नज़रों में काफी होनहार छात्र थे ,जिसके वज़ह से हमदोनों को कुछ सम्मानजनक दृष्टि से देखा जाता था।
पिता की हत्या के बाद कौसर काफी शांत रहने लगा था। अपने भाईयों में वह सबसे छोटा था। उसके बड़े भाईयों ने भी अपने पिता के व्यवसाय को अपना लिया था। खेती योग्य कुछ ज़मीन भी उनलोगों के पास थी।
कौसर के पढ़ाई के प्रति ललक और लगन को देखते हुए उसके सबसे बड़े भाई मो0 मुस्लिम ने उसका जिम्मा उठा लिया। स्कूल से लौटने के बाद कौसर अपने घर के काम में अपने भाई की मदद करता और जब सब सो जाते तो अपनी पढाई पूरी करता।
रबी फसल की बुआई हो चुकी थी। खेतों में पटवन का काम चल रहा था। शाम का वक्त था। मुझे किसी काम से घरवालों ने खेतों की ओर भेजा था। जब मैं खेत पर गया तो देखा की बगल वाले खेत की मेड़ पर कौसर बैठ कर कुछ पढ़ रहा था। उसके हाथो में स्कूल की किताबें थी।
खेती के काम में अपने भाई की मदद कर वह अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन भी कर रहा था, साथ साथ वह अपने सपनों को आकर भी दे रहा था।
गाँव के स्कूल की पढाई पूरी कर हम दोनों ने अपने गाँव से सात आठ किलोमीटर दूर स्थित हाईस्कूल में नामांकन करा लिया था। शुरूआती दिनों में मैं उसीकी साइकिल से स्कूल आया जाया करता था ,क्योंकि मेरे लिए साइकिल नहीं खरीदी गयी थी। बाद में मेरे लिए एक सेकंड हैंड साइकिल खरीदी गयी।
अब मैं उसकी दिलचस्प साइकिल का वर्णन आपलोगों के सामने करना चाहता हूँ, जो मेरे लिए भी बिलकुल कौतूहल का विषय था।
उसकी साइकिल में न तो पहिये के ऊपर लगने वाला कवर था ,न ही चैनकवर। बिलकुल सर्कस में इस्तेमाल होने वाली साइकिल की तरह थी उसकी साइकिल.
उसने मुझे बताया की इस साइकिल को उसके भाई दूध के बड़े बड़े कई डब्बों को ढ़ोने में इस्तेमाल करते हैं,
और इन चीज़ों को हटा देने से वज़नी सामानों को ले जाने में किसी तरह की परेशानी नहीं होती।
हाईस्कूल के दिन भी काफी मस्ती भरे दिन थे। कई नये नये मित्र बने। दो साल देखते देखते कैसे बीत गया पता ही नहीं चला।
उसी दौरान हुई एक रोचक घटना को मैं साझा कर रहा हूँ। स्कूल में एक वाद विवाद प्रतियोगिता का आयोजन किया गया था। प्रतियोगिता का विषय था " जनसंख्या नियंत्रण -जरुरी या गैरजरूरी "
कौसर ने प्रतिभागियों की सूचि में अपना नाम दर्ज़ करवा दिया, और तैयारी शुरू कर दी। उसने " जनसँख्या नियंत्रण -गैरजरूरी" के पक्ष में बोलने की तैयारी शुरू की। मैं उस प्रतियोगिता में शामिल नहीं था।
क्योंकि मुझे डर लगता था की शायद मैं लोगों के बीच में न बोल पाऊँ।
सभी छात्र अपने अपने विषय पर बोलने का अभ्यास कर रहे थे। तभी हमारे स्कूल के जीव विज्ञान के शिक्षक सुहैल सर की नज़र मुझ पर पड़ी। उन्होंने मुझसे पूछा कि संजय तुमने प्रतियोगिता में क्यों नहीं भाग लिया हैं? मैंने झिझकते हुए अपनी समस्या बताई कि मुझे बोलने में डर लगता है।
उन्होंने मुझे अपने पास बुलाया और कहा कि तुम्हे अभी मेरे सामने "जनसँख्या नियंत्रण -जरुरी" के पक्ष में कुछ बोलना है।
शिक्षक के आदेश को टालने का सवाल ही नहीं उठता था। मुझे जो भी समझ में आया मैंने अटकते हुए कुछ बोलने का प्रयास किया। उन्होंने तत्क्षण कहा की तुम्हें इस प्रतियोगिता में भाग लेना है।
मैंने वाद विवाद प्रतियोगिता में भाग लिया, और आपसबको जान कर आश्चर्य होगा कि प्रथम पुरस्कार मुझे ही प्राप्त हुआ। कौसर को द्वितीय पुरुस्कार मिला। पुरस्कार स्वरुप मुझे एक पुस्तक और उसे एक डिक्शनरी मिली थी, जिसे हमदोनो ने आपस में बदल लिया, क्योंकि डिक्शनरी उसके पास पहले से थी और मेरे पास डिक्शनरी नहीं थी।
ऐसी थी हमारी मित्रता।
हमदोनों ने मैट्रिक की परीक्षा फर्स्ट डिवीज़न से पास कर अपने शुभचिन्तको को निराश नहीं होने दिया।
यहीं से हमदोनो के रास्ते अलग हो गए। उसने लंगट सिंह महाविद्यालय मुजफ्फरपुर से अपनी आगे की पढाई की और मैंने मुंशी सिंह महाविद्यालय मोतिहारी से स्नातक किया।
बीच बीच में कभी कभी हमारी मुलाकात हो जाया करती थी। इसी दरम्यान वर्ष 1994 के दरोगा भर्ती परीक्षा में उसे सफलता मिल गयी, और वह दरोगा बनकर बिहार सरकार की नौकरी करने लगा। उसके परिवार के लोगों को ख़ुशी का ठिकाना न रहा।
उसकी शादी भी एक खूबसूरत पढ़ी लिखी लड़की से हो गयी थी। वह दो छोटी छोटी प्यारी बच्चियों का बाप भी बन गया।
यानि जितने कष्ट उसने बचपन में झेले थे मानो वो सब समाप्त हो गए थे। अब उसके जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ थी ।
उसकी बूढी माँ भी उसीके साथ रहती थी जिसे उसने वर्ष 2005 में हज़ यात्रा पर भी भेजा था।
अपने भतीजों की पढाई लिखाई की पूरी जिम्मेवारी भी उसीने संभाल रखी थी।
अचानक वर्ष 2006 के जुलाई महीने के अंतिम सप्ताह में मुझे यह खबर मिली कि कौसर की तबियत काफी ख़राब है। उसे कई दिनों से बुखार था जो उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था।
उस समय वह दक्षिण बिहार के किसी थाने का इंचार्ज था। उसकी गिनती काबिल अफसरों में होती थी।
बुखार की अवस्था में भी वह कुछ दिनों तक ड्यूटी करता रहा, और सामान्य बुखार समझ अपना इलाज भी करवाता रहा।
और एक दिन वह थाने में ही बेहोश हो गया। उसे आनन फानन में स्थानीय अस्पताल में भर्ती किया गया।
उसकी गंभीर स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने उसे वाराणसी रेफर कर दिया।
वाराणसी के अस्पताल में कई दिनों तक जीवन और मृत्यु के बीच झूलते हुए आखिरकार उसने इस दुनिया को
01 अगस्त 2006 को अलविदा कह दिया। मैंने अपने बचपन के मित्र को हमेशा के लिए खो दिया था।
संयोग देखिये कि उसी दिन शाम 4 बजे पटना के एक नर्सिंग होम में मेरी धर्मपत्नी ने मेरे छोटे बेटे को जन्म दिया।
संजय कुमार सिंह
पटना (वर्तमान में )
09-08-2020
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