वह कौन था ?
वह कौन था ?
बीता हुआ कल एक यादों का पुलिंदा होता है। उन यादों में कुछ ऐसी यादें भी शामिल होती हैं जिन्हें आप चाह कर भी नहीं भुला पाते। ऐसा हर व्यक्ति के जीवन में होता है।
आज मैं भी अपने यादों के झरोखे से एक ऐसी घटना को निकाल रहा हूं जिसे मैं भूल नहीं पाता। इस घटना ने मेरी ईश्वरीय शक्ति पर भरोसे को भी मजबूत किया है।
वर्ष 2001, महीना जुलाई। इसी वर्ष जून के महीने में मेरी शादी हुई थी। अपनी शादी और अन्य पारिवारिक दायित्वों की वजह से मैं लंबे समय से अपने गांव में ही रह रहा था। मेरा गांव बिहार के पूर्वी चंपारण जिले के अंतर्गत आता है ।
बूढ़ी गंडक और बागमती नदी से घिरा यह क्षेत्र वैसे तो पिछड़े श्रेणी के क्षेत्र में आता है, किंतु नदियों और आम लीची के बगीचों की वजह से इसकी अपनी एक खूबसूरती भी है। मेरा परिवार क्षेत्र के संपन्न किसानों में आता है। खेती- बारी की वजह से जमीनी विवाद से गहरा रिश्ता भी रहा है। कोर्ट कचहरी तो जैसे दिनचर्या का हिस्सा ही था। उस दिन मैं कचहरी के काम से मोतिहारी गया था। कचहरी के कामों को निपटा कर जब मैं घर वापसी के लिए मोतिहारी रेलवे स्टेशन पहुंच तो पता चला कि ट्रेन 3-4 घंटे विलंब है। उस समय शाम के 4:00 बज रहे थे। इसका मतलब था कि ट्रेन 7:00 बजे से पहले नहीं आने वाली थी। उन दिनों ट्रेनों का विलम्ब से चलना एक सामान्य सी बात थी। वैसे भी मोतिहारी से मेहसी स्टेशन 45-50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अमूमन इस दूरी को ट्रेन से 1:30 या 2 घंटे में तय कर लिया जाता था। यहां से मेरा गांव लगभग 6 किलोमीटर की दूरी पर है। बीच में बूढ़ी गंडक नदी है, जिसे नाव के जरिए पार किया जाता था। उन दिनों कोई पूल वगैरह नहीं था और नाव ही हम ग्रामीणों के लिए नदी पार करने का एकमात्र जरिया था।
7:00 बजे शाम को ट्रेन मोतिहारी स्टेशन पर आ गई थी। मैं ट्रेन में जाकर बैठ गया। मेहसी स्टेशन तक आते आते रात के 10:00 बज गए थे। स्टेशन से बाहर निकलने पर मैंने रिक्शे वाले की तलाश शुरू की।
कुछ दूरी रिक्शे की मदद से तय करना होता था, और जहां से कच्ची सड़क शुरू होती थी वहां के आगे कोई भी रिक्शा वाला जाने के लिए तैयार नहीं होता था। लेकिन उस रात कोई रिक्शा वाला मुझे नहीं मिला सभी अपने अपने घर चले गए थे ।10:00 बज रहे थे और मैंने अनुमान लगाया कि पैदल लगभग एक से डेढ़ घंटे में मैं घर पहुंच सकता हूँ ।
हालांकि रात में पैदल जाने का फैसला मेरा गलत भी हो सकता था ,क्योंकि एक तो मैं अकेला था और उन दिनों राहगीरों से लूटपाट और खून खराबे की घटनाएं भी हो रही थी। मेरे पास दो ही विकल्प था। या तो मैं उस छोटे से स्टेशन पर रात गुजारूं या फिर पैदल घर की ओर प्रस्थान करूं। मैंने दूसरे विकल्प को अपनाया।
मेहसी कस्बे को पार करते ही ग्रामीण इलाका शुरू हो गया था। उबर-खाबर रास्ते पर मैं चले जा रहा था। चांदनी रात होने की वजह से रास्ते लगभग स्पष्ट दिख रहे थे। बीच-बीच में हल्की फुल्की बूंदाबांदी भी शुरू हो गई थी। मैंने एक पगडंडियों वाला रास्ता चुन लिया था, जो नदी के किनारे तक जल्दी पहुंचा देता था।
पगडंडियों के दोनों तरफ खेतों में लगे धान के पौधे लहरा रहे थे। दूर हिलती हुई झाड़ियां कभी-कभी किसी अन्य चीजों का भी एहसास करा रही थी।कभी-कभी सिहरन सी दौड़ जाती थी।
हालांकि स्वभाव से मैं डरपोक नहीं था। गांव में बचपन बीतने के कारण कई बार रात में नदी भी पार की थी। किंतु इतने रात में अकेले चलने का यह मेरा पहला अनुभव था। नदी तक पहुंचते-पहुंचते रात के 11:00 बज चुके थे। किनारे के पास ही एक चिता जल रही थी जिसे लगता है शाम को ही जलाया गया था। चिता में लगे लकड़ियों का ढेर यह बता रहा था किसी संपन्न व्यक्ति की मृत्यु हुई होगी।
अब मैंने मल्लाहों को उनका नाम लेकर बुलाना शुरू किया। मुझे पता था कि रात 8:00 बजे के बाद नाव को गांव के तरफ वाले किनारे पर लगा देते थे। इस तरफ से आवाज देने वाले व्यक्ति की आवाज को पहचान कर ही नाव को दूसरे किनारे पर लाया जाता था।
ऐसा इसलिए किया जाता था कि कोई चोर डाकू दूसरे गांव से अपने गांव में प्रवेश नहीं कर पाए ।लगभग 2 घंटे तक चिल्लाने के बावजूद कोई मल्लाह नहीं आया ।बाद में मालूम हुआ कि सभी मल्लाह गांव में आयोजित एक भोज में शामिल होने चले गए थे।
चांदनी रात ,बगल में धू धू कर जलती हुई चिता ,नदी का किनारा और अकेला मैं । जरा कल्पना कीजिए ,क्या मनःस्थिति रही होगी मेरी ।चिल्ला चिल्ला कर मेरा गला बैठ चुका था ।वापस मेहसी के तरफ जाने की हिम्मत नहीं हो रही थी, क्योंकि कभी-कभी बूंदाबांदी भी हो जाती थी ।रात के 1:00 बज चुके थे मेरे पास किनारे पर बनी एक झोपड़ीनूमा मचान पर रात गुजारने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था।
मैंने मन ही मन मां दुर्गा का स्मरण कर जैसे ही मचान पर लेटने की कोशिश की, तभी नदी के बीच में एक काली सी आकृति आती हुई दिखाई दी ।यह आकृति धीरे-धीरे किनारे की तरफ बढ़ रही थी ।पहले तो मुझे लगा कि यह कोई लकड़ी का टुकड़ा होगा ,या किसी चीज का हिस्सा होगा जो धारा में बह गया होगा ,लेकिन किनारे की तरफ आते देखकर मैं चौकन्ना हो गया।
धीरे-धीरे किनारे की तरफ आने वाले आने वाली आकृति को गौर से देखने लगा ।
वह एक छोटी सी नाव थी,जिस पर दो से ज्यादा व्यक्ति नहीं बैठ सकते थे ।उस पर एक व्यक्ति बैठा हुआ था। मैंने उसे पहचानने की कोशिश की,पर पहचान नही पाया। उसने मुझसे पूछा कि उस पार जाना है? मैंने कहा हां।आइए बैठ जाइए, उसने कहा।
मैंने उससे उसका परिचय पूछा तो उसने अपना परिचय नहीं दिया ।मैं नाव पर जाकर बैठ गया ।उस पार उतार देने के बाद मैंने उसे कुछ पैसे देने चाहे ।उसने पैसे भी नहीं लिए।
कुछ क्षणों में वह नदी के बीच जाकर मेरे नजरों से ओझल हो गया ।मैं बिल्कुल आश्चर्यचकित था कि वह कौन था जिसने मेरी मदद की ।शायद ईश्वर ने मेरी मदद के लिए उसे भेजा था । उस घटना को मैं आज भी जब याद करता हूं तो मेरे शरीर में सिहरन सी दौड़ जाती है।
--🖋️संजय कु सिंह
[9:38 pm, 06/05/2020] Sanjay Kr Singh: sanjaynasa475@gmail.com
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