डायरी के पन्ने
डायरी के पन्ने कुछ अधूरी गज़ले थी, कुछ सूखे गुलाब थे, मेरे डायरी के पन्नो पर. कितने सारे ख़्वाब थे. निगाहों के सवाल थे, निगाहों के जवाब थे पुरे दिन की बाते थी, रातों के हिसाब थे. मन कहीं तो और था, पर हाथों में किताब थे दोस्त मेरे कम ही थे, जो भी थे नायब थे. संजय सिंह 23 /10 2020