हाथरस का सच

                                                         हाथरस का सच 

 हाथरस की घटना से पूरा देश मर्माहत है।  पीड़िता की  अस्मिता के साथ खेलने वाले और उसकी जान लेने वाले को कठोर से कठोर दंड मिलना चाहिए। 

भारतीय कानून में निर्भया कांड के बाद जो परिवर्तन हुए हैं, उसको देखते हुए यह कहना गलत होगा कि दोषियों को किसी तरह की राहत की गुंजाईश होगी।

लाख कोशिशों के बावजूद निर्भया कांड के सभी अभियुक्तों को अंत में फांसी पर लटकना ही पड़ा।

हाथरस की घटना को यदि गौर से देखा जाये तो यह प्रतीत होता है कि इसमें कुछ निर्दोष लोगों को भी फंसाया गया है।जिस तरह से पीड़िता का पहला बयान है,उसमे केवल एक अभियुक्त का नाम लिया गया। बाद में उसकी माँ का बयान भी पीड़िता के बयान से मिलता हुआ लगा। घटना की प्रारम्भिक रिपोर्ट पीड़िता के भाई के द्वारा थाने में दर्ज कराई गयी ,उसमे भी एक अभियुक्त के अलावा किसी और का नाम नहीं है। उस रिपोर्ट में भी बलात्कार जैसी घटना का जिक्र नहीं है।

फोरेंसिक और पोस्टमार्टम जो कि अहम् सबूत माने जाते हैं, उसमे भी बलात्कार जैसी घटना का नहीं घटित होना पाया गया।

पुरे घटनाक्रम में नाटकीय बदलाव तब आने लगा जब इसमें स्थानीय राजनीति घुसने लगी। पीड़िता का बयान ,उसकी माँ का बयान और उसके घरवालों का बयान सब बदलने लगा।
रही सही कसर मिडिया की आवश्यकता से अधिक की गई कवरेज ने पूरी कर दी।

मेरा कहने का अभिप्राय यही है कि पूरी घटना की निष्पक्ष जाँच हो। अगर कोई दोषी पाया जाता है तो उसे निश्चित रूप से सजा मिलेगी ही.लेकिन किसी निर्दोष को नाहक नहीं फंसाया जाये।



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