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गजल

गजल सूरज  को निकलते देखो, फुलों को खिलते  देखो, फिर भी दिल उदास हो, किसी बच्चे को मचलते देखो। आँखो के इशारे से हीं सही, जमी हुई बर्फ को पिघलते देखो। जिसकी रोशनी से रौशन हो रहे हो तुम उस चराग को जलते देखो। फिक्र सताती रही जिसे  तुम्हारी  जरा उस उम्र को ढलते  देखो।  

मुक्तक

मुक्तक   1.बेवजह दुश्मनी हम नहीं ठानते,   अपनी हद में रहना हम नहीं जानते   तुम कोई हमारे आका नहीं, जाओ,तुम्हारा हुक्म हम नहीं मानते। 2.तुम्हारी अदावत हमें पसंद है, ये बगावत हमें पसंद है, लोहे से लोहा कटता है, ये कहावत हमें पसंद है। 3.सन्नाटो का पहरा है, अंधेरा जरा गहरा है, दौर बुरा है, बीत जाएगा, वक्त भला कब ठहरा है। ----------------------------- संजय कु सिंह  पटना