ग़ज़ल

गज़ल 

वादों की चाशनी में ये लिपटे हुए   नारे 

उतार लाएंगे  ज़मी पर चाँद और सितारे,

जाकर सो जाना नींद में गहरे ,
बिस्तर पर ही आते हैं ये ख़्वाब सारे।

मिलना भी है जरुरी,पर मुश्किल बहुत है,
उफनता हुआ दरिया और तुम उस किनारे। 

न रब पर भरोसा, न खुद पर यकीं है ,
और कहते हो कि हैं मुक़द्दर के मारे।
 
भोर की किरणे दर पे आती हैं रोज़,
उठो और समझो कुछ इनके इशारे।
 
नफरत भी आए तो कुछ यूँ लौट जाए,
बना दो मोहब्बत की इतनी ऊँची दीवारें।
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संजय कु सिंह 

  Jo mere ghar kabhi nahi aayenge main... - The Rhyme Republic | Facebook

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